विकास की अवस्थाएँ तथा विशेषताएँ

बाल विकास के सिद्धांत

बाल विकास के सिद्धांत की  व्याख्या करने पर हम पाते हैं की “विकास परिवर्तन श्रृंखला की वह अवस्था है, जिसमें भूर्णावस्था से प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है।” विकास के परिणाम में व्यक्ति में नवीन क्रियाओं तथा गुणों का पादुर्भाव होता है। बाल विकास के सन्दर्भ में मनोवैज्ञानिकों ने अनेक सिद्धांत दिए हैं, जिन्हें विकास का सिद्धांत कहा जाता है।

तो चलिए हम इन सिद्धांतों को जानते हैं

समान प्रतिमान का सिद्धांत Principle of Uniform Pattern

ये सिद्धांत सभी जाती के जीवों पर लागू होता है। इस सिद्धांत में कहा गया है की विकास की गति का प्रतिमान समान रहता है तथा इनमें एक क्रम पाया जाता है जो की सभी प्रकार के प्रजाति के अनुसार एक समान रहता है। यह सिद्धांत मानव जाती के विकास पर भी लागू होता है। 

गेसेल के अनुसार:

यद्दपि दो व्यक्ति समान नहीं होते हैं, किन्तु सभी सामान्य बालकों में विकास का क्रम समान होता है।

संसार के सभी हिस्सों में बालकों का गर्भावस्था या जन्म के बाद विकास का क्रम सर से पैर की ओर होता है। इस सिद्धांत की पुष्टि हरलॉक ने भी की है। 

सामान्य से विशिष्ट क्रियाओं का सिद्धांत Principle of General to Specific Responses

इस सिद्धांत के अनुसार बालक का विकास समान्य से विशिष्टता की ओर होता है। बाल विकास के सभी आयामों में पहले सामान्य प्रतिक्रिया होती है, तत्पश्चात विशिष्ट रूप धारण करती है। उदहारण के लिए शैशवास्था में बालक किसी वस्तु को पकड़ने के लिए हाथ,पैर, मुख आदि को चलाता चलाता है परन्तु आयु बढ़ने पर वही वास्तु हाथ से पकड़ना शुरू कर देता है। इससे पता चलता है की बालकों में विकास सामान्य से विशिष्ट क्रियाओं की ओर होता है। 

सतत् विकास का सिद्धांत Principle of Continuous Development  

विकास का क्रम गर्भावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक सतत रूप में चलता रहता है। बालकों में गुणों का विकास तुरंत नहीं होता है बल्कि यह धीरे धीरे होने वाली प्रक्रिया है। उदाहरण स्वरुप हम देखते हैं की जब शिशु के दूध के दांत निकलते हैं जो हमें प्रतीत होता है की ये दांत अभी कुछ दिनों में निकल आये हैं परन्तु वास्तविकता ये है की ये दांत भूर्णावस्था से ही विकास करना शुरू कर देते हैं लेकिन मसूढ़ों से बाहर जन्म के ५ या ६ महीने बाद निकलते हुए दिखाई देते हैं। 

परस्पर सम्बन्ध का सिद्धांत Principle of Correlation

इस सिद्धांत का तात्यपर्य है की बालक के सभी गुण परस्पर समबन्धित हैं। गुण का विकास जिस प्रकार हो रहा है, अन्य गुण भी उसी अनुपात में विकसित होंगे; उदाहरण के लिए, तीव्र बुद्धि वाले बालक के मानसिक विकास के साथ उसका शारीरिक और सामाजिक विकास भी तीव्र गति से होता है। इसके विपरीत मंद बुद्धि वाले बालकों का शारीरिक एवं सामाजिक विकास भी मंद होता है।

शरीर के विभिन्न अंगों के विकास की गति में भिन्नता का सिद्धांत Principle of Differences in the Progress of Various Parts of the Body

शरीर के सभी अंगों का विकास एक गति से नहीं होता है। इनके विकास की गति में भिन्नता पाई जाती है। यही बात भी मानसिक विकास पर चरितार्थ होती है। शरीर के कुछ अंग तेज गति से विकसित होते हैं और कुछ मंथर गति से; उदारहण के लिए, 6 वर्ष की आयु तक मष्तिस्क विकसित होकर लगभग पूर्ण आकर प्राप्त कर लेता है, जबकि हाथ-पैर, नाक, मुँह का विकास किशोरावस्था तक पूरा हो जाता है। यह सिद्धांत शारीरिक पक्ष के साथ-साथ मानसिक पक्ष पर भी लागू होता है। बालक में सामान्य बुद्धि का विकास 14 या 15 वर्ष की आयु में पूर्ण हो जाता है, किन्तु तर्क शक्ति मंद गति के साथ विकसित होती रहती है।

विकास की दिशा का सिद्धांत Principle of Direction of Development

इसी को केंद्र परिधि की ओर विकास का सिद्धांत कहते हैं। इसमें विकास सिर से पैर की ओर एक दिशा के रूप में होता है। बालक का सिर पहले विकसित होता है और पैर सबसे बाद में। यही बात उसके अंगों के नियंत्रण पर भी लागू होती है। बालक जन्म के समय बाद सर्वप्रथम अपने सिर को ऊपर उठाने का प्रयास करता है। 9 माह की आयु में वह सहारा लेकर बैठने लगता है। धीरे-धीरे घिसट कर चलते-चलते वह पैरों के बल पर एक वर्ष की आयु में खड़ा हो जाता है।

व्यक्तिगत भिन्नता का सिद्धांत Principle ऑफ़ Individual Differences

बालकों के विकास के क्रम में व्यक्तिगत विभिन्नताएँ भी अपना प्रभाव दिखाती है, इनके प्रभाव के कारण विकास की गति में अंतर आ जाता है। किसी की विकास की गति तीव्र और किसी की मंद होती है। अतः आवश्यक नहीं की सभी बालक एक निश्चित अवधि पर ही किसी विशिष्ट अवस्था की परिपक़्वता प्राप्त कर लें।

भिन्नता का सिद्धांत Principle ऑफ़ Dissimilarity

विकास का क्रम एक सामान हो सकता है किन्तु विकास की गति एक सामान नहीं होती है। विकास की गति शैशवावस्था एवं किशोरावस्था में तीव्र रहती है, बालक एवं बालिकाओं की विकास-गति में भी भिन्नता पाई जाती है।

निरंतर विकास का सिद्धांत Principle ऑफ़ Continual Development

विकास की प्रक्रिया एक सास्वत प्रक्रिया है जो निरंतर चलती रहती है। यद्दपि विकास की गति सदैव सामान नहीं रहती, परन्तु अपनी चरम सीमा पर पहुँचने से पूर्व कभी नहीं रूकती। जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति में कोई आकस्मिक परिवर्तन नहीं होता। बालक में शारीरिक और मानसिक गन यकायक विकसित नहीं हो जातें, उसमें भाषा का विकास एक ही दिन में नहीं हो जाता अपितु इसकी नीव बालक में जन्म से ही पड़ जाती है।

एकीकरण का सिद्धांत Principle of Unitary

विकास की प्रक्रिया एकीकरण सिद्धांत का पालन करती है। इसके अनुसार बालक अपने संपूर्ण अंग को और फिर अंग के भागों को चलना सिखाता है उसके बाद वह उन भागों में एकीकरण करना सीखता है। सामान्य से विशेष की ओर बदलते हुए विशेष प्रक्रियाओं तथा चेष्टाओं को इक्कठे रूप से प्रयोग में लाना सीखता है। उदाहरण के लिए एक बालक पहले पूरे हाथ को, फिर अँगुलियों को और फिर हाथ एवं अँगुलियों को एक साथ चलाना सीखता है।

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