वृद्धि एवं विकास का अर्थ Meaning of growth and development

वृद्धि एवं विकास का अर्थ

वृद्धि एवं विकास का अर्थ
Tina Floersch

वृद्धि एवं विकास का अर्थ – हम प्रायः ‘वृद्धि‘ और ‘विकास‘, दोनों शब्दों का अर्थ एक ही रुप में करते हैं लेकिन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ये एक दुसरे से कुछ अलग होते हैं। हम इसे इस प्रकार से समझ सकते हैं-

सोरेन्सन (Sorenson) के अनुसार वृद्धि एवं विकास का अर्थ,

‘अभिवृद्धि शब्द का प्रयोग सामान्यतः शरीर और उसके अंगों के भार तथा आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है। इस वृद्धि को नापा या तौला जा सकता है। विकास का सम्बन्ध अभिवृद्धि से अवश्य होता है पर यह शरीर के अंगों में होने वाले परिवर्तनों को विशेश रूप से व्यक्त करता है। उदहारण के स्वरुप में बालक की हड्डियां आकार में बढती हैं, यह बालक की अभिवृद्धि है, किन्त्तु हड्डियां कड़ी हो जाने के कारण उनके स्वरूप में जो परिवर्तन आ जाता है, यह विकास को दर्शाता है। इस प्रकार विकास में अभिवृद्धि का भाव निहित रहता है.

हम प्रायः यह भी देखते हैं की बालक का शारीरिक विकास में प्रगति होने के साथ-साथ उसके कार्यकुशलता में विकास नहीं हो पता है. इस प्रकार यह कहा जाता है की बालक में वृद्धि तो हो गई है परन्तु कार्य करने की क्षमता में विकास नहीं हो पाया है. इस प्रकार विकास, शारीरिक अवयवों की कार्य-कुशलता की ओर संकेत करता है जैसा की सोरेंसांस के विचारों में व्यक्त है, अभिवृद्धि को मापा जा सकता है, किन्तु विकास व्यक्ति की क्रियाओं में निरंतर होने वाले परिवर्तनों में परिलक्षित होता है. अतः मनोवैज्ञानिकों के अनुसार विकास केवल शारीरिक आकारों में परिवर्तन होना ही नहीं है, यह नई-नई विशेषताओं और क्षमताओं का विकसित होना है जो गर्भावस्था से आरम्भ होकर परिपक्वता तक चलता रहता है.

हरलॉक के विचारों में वृद्धि एवं विकास का अर्थ,

“विकास, अभिवृद्धि तक ही सिमित नहीं है इसके बजाय, इसमें परिपक्वता  के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता है। विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएं और नवीन योग्यताएं प्रकट होती है। “

“विकास की प्रक्रिया बालक के गर्भवस्था से लेकर जीवन-पर्यन्त एक क्रम में चलती रहती है तथा प्रत्येक अवस्था का प्रभाव दूसरी अवस्था पर पड़ता है। “

गैसेल के अनुसार वृद्धि एवं विकास का अर्थ,

“विकास प्रत्यय सेअधिक है। इसे देखा,जांचा,और किसी सीमा तक तीन प्रमुख दिशाओं -शरीर अंक विश्लेषण , शरीर ज्ञान व्यवहारणात्मक से मापा जा सकता है। इन सब में व्यावहारिक संकेत ही सबसे अधिक विकासात्मक स्तर और विकासात्मक शक्तियों को व्यक्त करने का माध्यम है।”

वृद्धि और विकास में अंतर

वृद्धि
विकास
स्वरुप बाहरी होता है। विकास आतंरिक होता है।
दिशाहीन होती है।इसकी निश्चित दिशा होती है।
कुछ समय बाद वृद्धि रुक जाती है। जीवन-पर्यन्त विकास चलता रहता है।
इसका प्रयोग संकुचित अर्थ में होता है।इसका प्रयोग व्यापक अर्थ में होता है।
इसमें कोई निश्चित क्रम नहीं होता है। विकास में एक निश्चित क्रम होता है।
सीधे मापा जा सकता है।
उदाहरणार्थ ऊंचाई और भार को सीधे माप मापा जा सकता है।
सीधे मापा नहीं जा सकता है।
उदाहरणार्थ, बुद्धि को सीधे मापा नहीं जा सकता है।

विकास की विभिन्न अवस्थाएं various stages of Development:

उपरोक्त बातों में हमने वृद्धि और विकास में अंतरों को जाना अब विकास की विभिन्न स्तरों को जानेंगे-

चरण
उम्र
बाल्यावस्थाजन्म से ३ वर्ष तक
प्रारंभिक शैशवावस्था३ से ६ वर्ष तक
मध्य शैशवावस्था ६ से ९ वर्ष तक
अत्याशैशवास्था ९ से १२ वर्ष तक
पूर्व किशोरावस्था ११ से १५ वर्ष तक
किशोरावस्था १५ से १८ वर्ष तक
वयस्क १८ वर्ष के बाद

रॉस के अनुसार विकास की विभिन्न अवस्थाएं:

चरण
उम्र
शैशवावस्था१ से ५ वर्ष तक
बाल्यावस्था५ से १२ वर्ष तक
किशोरावस्था १२ से १८ वर्ष तक
प्रौढ़ावस्था१८ वर्ष के बाद

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प्रदीप कर्ण 

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