सामाजिक विकास

वृद्धि और विकास के विभिन्न आयाम

वृद्धि और विकास के विभिन्न आयाम Various stage of growth and development

वृद्धि और विकास के विभिन्न आयाम
वृद्धि और विकास के विभिन्न आयाम

यदि आप CTET , TET या फिर बी.एड. परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो ये आर्टिकल जरूर पढ़ें।

यदि वृद्धि और विकास को एक ही नज़र से देखा जाये तो बच्चे का सर्वांगीण विकास हमे निम्न पहलुओं में दिखाई देगा।

  • सामाजिक विकास
  • नैतिक विकास
  • संवेगात्मक विकास
  • मानसिक विकास
  • शारिरीक विकास
  • गामक विकास
  • भाषात्मक विकास

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सामाजिक विकास social development

सामाजिक विकास
सामाजिक विकास

वृद्धि और विकास को हम सामाजिक विकास के तौर पर इस तरह से अध्ययन कर सकते हैं:

समूह स्तर पर जो सीखने की प्रक्रिया होती है उसे सामाजिक विकास कहा जाता है। इसमें मेल-जोल, रीति-रिवाज, परम्पराएं, सहयोग इत्यादी शामिल हैं। मनोवैज्ञानिकों ने समाजिक विकास को अपने-अपने शब्दों में परिभाषित किए हैं:

हरलॉक

सामाजिक विकास से अभिप्राय सामजिक सम्बन्धों में परिपक्वता प्राप्त करने से है।

सोरेन्सन्स

सामाजिक वृद्धि एवं विकास से हमारा तात्य्पर्य अपने साथ और दूसरों के साथ भली-भाँति चलने की बढ़ती हुई योग्यता से है।

ऊपर जो परिभाषाएँ दी गई हैं उनसे जो परिणाम निकलते हैं वो निम्नलिखित है:

  • बच्चे जब दूसरे व्यक्तियों के संपर्क में आते हैं तो उनकी सामाजीकरण के प्रक्रिया शुरू हो जाती है। 
  • समाजीकरण की प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति समाज के अनेक गुणों को सीखने में सहायता प्राप्त करता है। 
  • इस वजह से व्यक्ति समाज के साथ शीघ्र ही ताल-मेल बिठा लेता है। 

शैशवावस्था में सामाजिक विकास

इस अवस्था में बालक समाज से पूर्णतः अनभिज्ञ होता है तथा केवल अपने शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करने में लगा रहता है।  जब बालक वस्तु और इंसान में फर्क समझने लगता है तब सामाजिक वव्यवहार प्रकट करना शुरू करता है।

बाल्यावस्था में सामाजिक विकास

इस अवस्था में बच्चे में समायोजन तथा गिरोह बनाने की क्षमता का विकास हो जाता है। 

किशोरावस्था में सामाजिक विकास

इस अवस्था में किशोर किसी अन्य किशोर या किशोरी के साथ समूह बनाने की कोशिश करते हैं। इसे हम मुख्य दो बिंदुओं के द्वारा जान सकते हैं :

  • लिंग सम्बन्धी चेतना का विकास हो जाता है। 
  • विशेष रुचियाँ जागृत हो जाती हैं। 

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नैतिक विकास Moral Development

वृद्धि और विकास को हम नैतिक विकास के तौर पर इस तरह से अध्ययन कर सकते हैं:

नैतिक संकल्पनाओं के अंतर्गत बच्चों में मूल्यों का विकास एवं नैतिक संकल्पनाओं की भावनाओं का उदय होता है। इसमें मूल रूप से ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, निश्छलता की भावना को विकसित करना होता है। समाज की अपेक्षा के अनुसार बच्चों को समुदाय के मानकों के अनुरूप चलना चाहिए क्योंकि प्रत्येक समाज में कुछ कार्यों को गलत समझा जाता है तो कुछ को सही। इसमें बच्चे अपने नैतिक संकल्पनाओं से जुड़ते हैं।  शुरू में वे प्रयास और त्रुटि परिवार और विद्यालय के माध्यम से सीखते हैं जो समाज द्वारा स्वीकृत होता है। इसके बाद वे अमूर्त भाषिक रूप में नैतिक संकल्पनाएं अपनाकर सही या गलत के नियम एवं सिद्धांत सीखते हैं। 

संवेगात्मक विकास Emotional Development

वृद्धि और विकास को हम संवेगात्मक विकास के तौर पर इस तरह से अध्ययन कर सकते हैं:

संवेगात्मक विकास में व्यक्ति के आवेश के बारे में बताया गया है। जिसमें भय, क्रोध, घृणा, वात्सल्य, करुणा, आश्चर्य, इत्यादि शामिल है। यह हमारे विचार प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। संवेग मूल प्रवृतियों से सम्बंधित होते हैं। यद्दपि यह शैशवास्था में अस्थिर होते हैं लेकिन बाल्यावस्था में स्थिरता की ओर अग्रसर होना शुरू कर देता है। किशोरावस्था में ये अधिक उग्र होते हैं। संवेग को प्रभावित करने वाले कारक बहुत होते हैं जैसे – वंशानुक्रम, स्वास्थ्य, मानसिक योग्यता, पारिवारिक वातावरण, सामाजिक वातावरण इत्यादि। हमारा विद्यालय इसमें अहम् भूमिका निभाता है। शिक्षकगण तथा अभिभावकगण बच्चों के संवेगात्मक विकास को सही दिशा दे सकते हैं।

मानसिक विकास Mental Development

mental development
मानसिक विकास

वृद्धि और विकास को हम मानसिक विकास के तौर पर इस तरह से अध्ययन कर सकते हैं:

मानसिक विकास से तात्पर्य शक्तियों तथा संवेदनशीलता, अवलोकन, प्रत्ययीकरण, स्मृति, ध्यान, कल्पना, चिंतन, बुद्धि, तर्क आदि में वृद्धि से होती है। शैशवास्था एवं बाल्यावस्था में मानसिक विकास तीव्र गति से होता है जबकि किशोरावस्था में मानसिक शक्तियों में गुणात्मक उन्नयन अधिक होता है।

पियाजे के अनुसार:

संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाएं क्रमशः संवेदनात्मक गामक अवस्था, पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था, मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था तथा औपचारिक-संक्रियात्मक अवस्था हैं। 

पियाजे ने संगठन तथा अनुकूलन की योग्यताओं को संज्ञानात्मक कार्य विधि की दो प्रमुख विशेषताएं बताया है। ब्रूनर ने क्रियात्मक, प्रतिबिम्बात्मक, तथा संकेतात्मक नामक तीन अवस्थाओं में संज्ञानात्मक विकास को वर्गीकृत करके संज्ञानात्मक विकास की प्रक्रिया को समझने का प्रयास किया है। मानसिक विकास अनेक कारणों से प्रभावित होते हैं  जैसे – वंशानुक्रम, वातावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा, समाज, आदि।

शारीरिक विकास Physical Development

शारीरिक विकास

वृद्धि और विकास को हम शारीरिक विकास के तौर पर इस तरह से अध्ययन कर सकते:

किसी व्यक्ति के उसके बाह्य एवं आतंरिक अवयववों का विकास होना शारीरिक विकास कहलाता है। जन्म से लेकर युवावस्था तक मनुष्य के शरीर का वजन व ऊँचाई बढ़ती रहती है। लेकिन हर इंसान में बढ़ने की प्रक्रिया अलग-अलग होती है। किसी में तेजी से होती है तो किसी में धीमी। पैदा होने के एक साल बाद किसी बच्चे की ऊंचाई डेढ़ गुना हो जाती है और दूसरे वर्ष तक 75% बढ़ जाती है। इसी दौरान शरीर का वजन चार गुना बढ़ जाता है। शारीरिक विकास शैशव काल में तेज, बाल्यावस्था में धीमी तथा किशोरवस्था में फिर से तेज हो जाती है।

गामक विकास Dynamical Development

वृद्धि और विकास को हम गामक विकास के तौर पर इस तरह से अध्ययन कर सकते हैं:

गामक विकास में बालक की गामक तथा क्रियात्मक योग्यताओं एवं क्षमताओं का विकास होता है। इस समय उनकी हड्डियां मुलायम और शरीर लचीला होता है। इस वजह से वे और कौशल सीखने के लिए समर्थ होते हैं। वे नित्य नए-नए क्रियाओं को सीखने की कोशिश करते रहते हैं। शारीरिक क्रियाओं में भाग लेते हैं। अन्य बच्चों के साथ और ज्याद अन्तःक्रिया करते हैं। शारीरिक और क्रियात्मक कौशल उन्हें स्वतंत्र बनाते हैं तथा कौशलों के प्रयोग से वातावरण को समझ पाते हैं।

भाषात्मक विकास Language Development

वृद्धि और विकास को हम भाषात्मक विकास के तौर पर इस तरह से अध्ययन कर सकते

भाषात्मक विकास में बालक अपने विचारों की अभ्व्यक्ति के लिए भाषा का जानना और प्रयोग से सम्बंधित योग्यताओं का विकास शामिल होता है। 

इस पोस्ट में वृद्धि और विकास के विभिन्न आयाम के बारे में आपने जाना। इस पोस्ट को लेकर अगर आपके मन में कोई सवाल है तो आप कमेंट बॉक्स में चर्चा कर सकते हैं, आपको रिप्लाई अवश्य मिलेगा।

नोट: पाठ्य स्रोत, पहले से उपलब्ध पुस्तक, इंटरनेट स्रोत तथा अन्य स्रोतों से अध्ययन करके तैयार किया गया है। ओरिजिन क्लासेज का मकसद सिर्फ जानकारी उपलब्ध कराना  है।

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