विकास की अवधारणा और इसका अधिगम से सम्बन्ध

विकास की अवधारणा और इसका अधिगम से सम्बन्ध

विकास का अर्थ (Meaning of Development):

विकास की अवधारणा और इसका अधिगम से सम्बन्ध– विकास प्रगतिशील परिवर्तनों के रूप मे स्वीकार किया जाता है जिसका अर्थ है परिवर्तन. परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है जो हर समय चलती रहती है. मनुष्य की अभिवृद्धि एवं विकास माँ के गर्भ से प्रारम्भ होकर जन्म के बाद जीवन भर चलता रहता है. विकास कई अवस्थाओं से होकर गुजरता है, किसी अवस्था में तीव्र होती है तो किसी में मन्द तो किसी में सामान्य. यहां व्यक्तिगत भिन्नता भी देखने को मिलती है. मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उसके शरीर के बाह्य एवं आन्तरिक अंगों में होने वाली वृद्धि से होता है, जबकी मानव विकास से तात्पर्य उसकी अभिवृद्धि के साथ-साथ उसके शारिरीक एवं मानसिक व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों से होता है. विकास की प्रक्रिया एक अविरल, क्रमिक एवं सतत् प्रक्रिया होती है. आयु बढ़ने के साथ बालक का शारिरीक, मानसिक, सम्वेगत्म्क, क्रियात्मक, भाषगत एवं समाजिक विकास होता है. अनुभवों के द्वारा वह नये-नये कार्यों को सीखता है, पुराने कामों को समार्जन भी करता है. विकास में परिपक्वता की ओर बढ़ने का निश्चित क्रम होता है जिसमे एक व्यवस्था होती है. उदहारण के तौर पर यदि किसी वृक्ष के बारे में कहा जाय की वृक्ष में अभिवृद्धि तो हुई है पर विकास नही हुआ तो इसका मतलब ये है की वृक्ष की लम्बाई, चौड़ाई और डालियों में तो वृद्धि हुई है पर फल-फूल नही रहा है.

इनका तुलनात्मक अध्ययन, अभिवृद्धि से,  इस प्रकार से कर सकते हैं

अभिवृद्धि एवं विकास में अन्तर

अभिवृद्धि (Growth)

विकास (Development)

1.यह एक संकीर्ण अवधारणा है. 1.विकास एक व्यापक अवधारणा है.
2.अभिवृद्धि विकास की प्रक्रिया है. 2.विकास में अभिवृद्धि निहित है.
3.अभिवृद्धि में बालक के किसी पक्ष में कुछ निश्चित परिवर्तन होता है. 3.विकास के सभी क्षेत्रों में  व्यापक परिवर्तन होता है.
4.सिर्फ शारिरीक परिवर्तन को प्रकट करता है.   4.सम्पूर्ण पक्षों के परिवर्तन को संयुक्त रूप से परिवर्तन करता है.
5.अभिवृद्धि को मापा जा सकता है तथा इसकी मात्रात्मक व्याख्या की जा सकती है. 5.विकास गुणात्मक होता है जिसका मूल्यांकन व्यक्ति के कार्यों तथा व्यवहारों से होता है.
6.परिणात्मक परिवर्तन की अभिव्यक्ति. 6.गुणात्मक तथा परिणात्मक पक्षों की अभिव्यक्ति.
7.आकर में परिवर्तन अभिवृद्धि है. 7.जन्म से मृत्यु तक चलने वाली प्रक्रिया.
8.विशेष आयु तक चलने वाली प्रक्रिया. 8.विकास विभेदीकरण तथा विशिष्ट कारण की प्रक्रिया है.
9.अभिवृद्धि कोषीय वृद्धि है. 9.विकास शारीर की विभिन्न अंगों में व्यक्ति तथा सामर्थ्य का संगठन है.
10.परिवर्तनों को देखा तथा नापा जा सकता है. 10.परिवर्तनों को अनुभव किया जा सकता है परन्तु नापा नहीं जा सकता है.

बाल विकास:

बाल विकास दो शब्दों से मिलकर बना है – बाल अथवा बालक तथा विकास. प्रारंभिक बाल्यावस्था का समय शून्य से लेकर आठ वर्ष तक का होता है किन्तु बाल विकास की बात आती है तो ये गर्भावस्था से लेकर युवावस्था तक का होता है. गर्भावस्था से मानव का जीवन आरम्भ होता है. अतः विकास जन्म से नहीं गर्भावस्था से ही शुरू हो जाता है. इसके क्रम इस प्रकार से हो सकते :

गर्भावस्था -> शैशवावस्था -> बाल्यावस्था -> किशोरावस्था -> प्रौढावस्था. इन सभी अवस्थाओं से गुजरते हुए परिपक्वता की स्थिति प्राप्त करता है.

जन्म के बाद शिशु का शारीरिक तथा मानसिक क्षमताओं के स्वरुप में जो क्रमिक परिवर्तन होते हैं इन्ही का नाम विकास है. इस प्रकार बाल विकास को तीन पहलुओं में विभाजित किया जा सकता है- उत्पत्ति, वृद्धि, एवं अपकर्ष. ये तीनों पहलु एक क्रम में संयुक्त होते हैं. ये प्राणी में होने वाले परिवर्तनों के तीन श्रेणियों के समान हैं जिनसे उसका सारा जीवन गुजरता है.

विकास में होने वाले परिवर्तन:

आयु बढ़ने के साथ-साथ विकास में कुछ निश्चित परिवर्तन दिखाई देते हैं. इन परिवर्तनों को निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है-

    1. आकार में परिवर्तन
    2. अनुपात में परिवर्तन
    3. नयी आकृतियों का लो
    4. नयी आकृतियों की प्राप्ति
  1.  

विकास का आधार (Foundation of Development):

मानव विकास के दो आधार है:- 1. वंशानुक्रम तथा 2. पर्यावरण.

वंशानुक्रम(Heredity):

वंशानुक्रम का सामान्य अर्थ मनुष्य के जन्मजात गुणों से होता है जो माता पिता के द्वारा आता है. वंशानुक्रम के मुख्य रूप से तीन नियमों का प्रतिपादन किया गया है-

  1. समान, समान को जन्म देता है:

यह समानता का नियम है, जैसे माता पिता होते हैं वैसे ही उनकी संतानें होती हैं. उदाहरण के लिए रंग, रूप, कद-काठी, भार, इत्यादि माता पिता के अनुरूप होते हैं.

  1. विभिन्नता का नियम:

यह नियम हमें बताता है की जन्म से दो व्यक्ति पूर्णरूप से समान नही होते उनमे कुछ न कुछ भिन्नता अवश्य होते हैं.

  1. प्रत्यागम का नियम:

यह नियम बताता है कि बच्चे अपने माता पिता के विशिष्ट गुणों के स्थान पर सामान्य गुण ही ग्रहण करते हैं. वंशानुक्रम में मातृपक्ष और पितृपक्ष के कई पीढ़ियों से गुण एक निश्चित मात्रा में बालकों में आते हैं. वंशनुक्रम की प्रक्रिया से स्पष्ट है कि बच्चे के लिंग, स्वास्थ्य, रूप एवं बुद्धि सबके निर्धारण पित्रैक होते हैं.

पर्यावरण (Environment):

पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है संपूर्ण आवरण. इसमें दो मुख्य क्षेत्र आते हैं – प्राकृति और दुसरा समाज. प्राकृति पर्यावरण से तात्पर्य स्थान विशेष की प्राकृतिक परिस्थितियों-नदी, पहाड़, जल, वायु एवं तापमान आदि से होता है.जबकि सामाजिक पर्यावरण से तात्पर्य व्यक्ति विशेष की उन पारिवारिक, सामजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों से होता है जिनमे वह रहता है. विकास का प्रमुख आधार वातावरण है जो सभी प्रकार के विकास को प्रभावित करता है. व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक वॉटसन ने तो यहां तक दावा किया था- मुझे नवजात शिशु दे दो , मै उसे डॉक्टर, वकील, चोर या जो भी चाहूँ बना सकता हूँ. मनुष्य के व्यक्तित्व के निर्माण में उसके वंशानुक्रम से ज्यादा उसके पर्यावरण का प्रभाव होता है.

अभिवृद्धि एवं विकास में वंशानुक्रम एवं पर्यावरण का प्रभाव:

शिक्षा मानव विकास का साधन है और मानव विकास निर्भर करता है उसके वंशानुक्रम एवं पर्यावरण पर हम किसी व्यक्ति का उतना ही विकास कर सकते है जितनी उसमे जन्मजात विकास शक्तियां-बुद्धि एवं अभिक्षमता आदि होते हैं. बालकों के किसी भी प्रकार के उचित विकास के लिए तदनुकूल पर्यावरण की आवश्यकता होती है. बालकों के सामजिक, सांस्कृतिक और नैतिक आदि विकास के लिए भी उन्हें तदनुकूल पर्यावरण प्रदान करना आवश्यक होता है. मनुष्य के विकास में उसके वंशानुक्रम एवं पर्यावरण दोनों का हाथ होता है दूसरी तरफ शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय करक है. शिक्षा मनुष्य के स्वाभाविक विकास को भी गति प्रदान करती है. वंश परंपरा मनुष्य के अन्दर भले ही विद्यमान हो लेकिन जब तक उसे अनुकूल पर्यावरण नहीं मिलेगा उसका विकास नहीं होगा.

4 thoughts on “विकास की अवधारणा और इसका अधिगम से सम्बन्ध

  1. बहुत ही बढ़िया जानकारी। इसी तरह की जानकारी दें TET एग्ज़ाम के लिये उपयोगी है।

  2. विकास =परिपक्वता +अधिगम होगा या परिपक्वता × अधिगम

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