विकास की अवस्थाएँ तथा विशेषताएँ

विकास की अवस्थाएँ तथा विशेषताएँ

विकास की अवस्थाएँ तथा विशेषताएँ

विकास की अवस्थाएं तथा विशेषताएँ (stages of development and charecterstics)

विकास की अवस्थाएँ तथा विशेषताएँ – मानव विकास एक सतत् प्रक्रिया है. यह कई अवस्थाओं से होकर गुजरता है. प्रत्येक अवस्था की अपनी अलग विशेषताएँ और समस्याएँ होते हैं. शारीरिक विकास तो एक सीमा के बाद रुक जाता है, किन्तु मनोशारीरिक क्रियाओं में विकास निरंतर चलता रहता है. इन मनोशारिरिक क्रियाओं के अंतर्गत मानसिक, भाषायी, संवेगात्मक, सामाजिक एवं चारित्रिक विकास इत्यादी आते हैं. मनीषियों ने मावन विकास की अवस्थाओं को सात भागों में विभाजित किया है-

विकास की अवस्थाएँ तथा विशेषताएँ
विकास की अवस्थाएँ तथा विशेषताएँ
  • गर्भावावस्था गर्भधारण से जन्म तक
  • शैशवस्था जन्म से 5 वर्ष तक
  • बाल्यावस्था 5 वर्ष से 12 वर्ष तक
  • किशोरावस्था 12 वर्ष से 18 वर्ष तक
  • युवावस्था 18 वर्ष से 25 वर्ष तक

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गर्भावस्था: विकास एवं विशेषताएँ

गर्भाधान एवं गर्भावस्था, जीवन विकास की नीव है. इसका प्रभाव दूरगामी होता है. सभी समाजों में गर्भाधान एक अति महत्वपूर्ण संस्कार के रूप में माना जाता है. शिशु के शारीरिक तथा मानसिक घटकों का निर्माण गर्भकाल में ही प्रारंभ हो जाता है. इसलिए माँ के उपादान पवित्र एवं बलिष्ठ होंगे तो उसमें निर्मित बालक भी पवित्र और बलिष्ठ होगा. माँ की मनोदशा का प्रभाव भी शिशु पर पड़ता है. जो माता तनावमुक्त एवं प्रसन्न रहती है उनके गर्भस्थ शिशु का विकास भी अच्छा होता है लेकिन इसके विपरीत जो माताएँ क्रोध करती हैं, तनावग्रस्त रहती हैं उनके शिशुओं का विकास ठीक ढंग से नहीं हो पता है. शुद्ध सात्विक जीवन बिताने वाली माताएँ ही महान आत्मा को अपने उदार में रखने का दावा कर सकती है.

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भारत में गर्भाधान एक संस्कार के रूप में स्वीकार्य है. इसलिए यहाँ की गर्भवती महिलाओं को पवित्र, सुन्दर, सकारात्मक बातों से युक्त कवितायेँ और कहानियाँ सुनाने की परमपरा प्राचीन काल से ही रही है. पुरानों में इसके कई उल्लेख मिलते हैं. उदाहरण के लिए आप अभिमन्यु को ले सकते हैं जिन्होंने गर्भावस्था में चक्रव्यूह भेदन का ज्ञान प्राप्त किया था. प्रहलाद नें गर्भ में ही भागवत तत्त्व को प्राप्त कर लिया था. इसलिए प्राचीन भारतीय समाज में गर्भाधान के समय माता-पिता वांछित पुत्र की छवि अपने मनोदशा में रखते थे. उस युग के मनीषियों ने बालकों में आध्यात्मिकता का विकास करने के लिए सद्ग्रंथों को पढने की सलाह दी है. माताओं का आचार-विचार, आहार,  स्वाध्याय संग गर्भस्थ शिशु के विकास को निश्चित दिशा प्रदान कर सकता है.  

शैशवावस्थाएं : विकास एवं विशेषताएँ

जन्म से छ: वर्ष की अवस्था को शैशवावस्था कहा जाता है. इस अवस्था में ग्रहनशीलता और विकास की गति तीव्र होती है. बालक में पैरों की कौशल सम्बन्धी विकास 18वें महीने से शुरू हो जाता है. शारीरिक विकास भी तेजी से होता है. इस अवस्था में शारीरक मानसिक विकास के साथ-साथ संवेगात्मक, भाषाई, सामाजिक चारित्रिक, इत्यादि का भी विकास होनें लगता है. वास्तव में शैशवावस्था जीवन का वह काल है जब शिशु परनिर्भरता से आत्मनिर्भरता की और बढ़ने लगता है. आत्म अधिकारों का ज्ञान भी बच्चों में इसी अवस्था से होने लगता है. शिक्षा की दृष्टी से ये अवस्था बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, प्रयोगों एवं निरिक्षण के द्वारा यह तथ्य उजागर हुआ है की प्रथम 6 वर्ष में बच्चे आगे के 6 वर्षों से अधिक सीखते हैं. लेकिन यह तभी संभव है जब शिशुओ की शिक्षा व्यवस्था उनके शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक और सामाजिक विषयों को मुख्य आधार बनाकर किया जाय.

बाल्यावस्था: विकास तथा विशेषताएं:

सामान्यतः बाल्यावस्था का काल 6 से 12 वर्ष के बीच को कहा जाता है. इस काल में बच्चों में चिंतन एवं तर्क शक्तियों का विकास हो जाता है. इस अवस्था में स्थायित्व आने लगता है. वास्तव में ये जीवन महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इसमे जो संस्कार प्राप्त होते हैं वो जीवन भर रहते हैं. इसलिए इस काल को निर्माणकारी काल कहा जाता है. इसलिये ये अवस्था सिखने तथा समझने की सबसे सर्वोत्तम अवस्था है.

किशोरावस्था:

12 से 18 वर्ष की अवस्था किशोरावस्था कहलता है. यह एक भावुक एवं उन्मुक्त विचारों वाली अवस्था है. इसमें अत्यधिक उर्ज़ा एवं कुछ कर गुजरने की क्षमता निहित होती है. यह विशिष्ट परिवर्तनों वाली अवस्था है जिसमें यौन समस्या इस अवस्था की सबसे बड़ी समस्या है. किशोरावस्था का जीवन द्वन्दों से भरा होता है, यदि उचित मार्ग नही मिल पाया तो भटकने की सम्भावना होती है.

वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करने वाले कारक:

वृद्धि एवं विकास के स्वरूप एवं गति को अनेक कारक प्रभावित करते हैं. विकास की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं पर एवं भिन्न-भिन्न पक्षों के लिए इन कारकों की भिन्न-भिन्न महत्वपूर्ण भूमिका रहती है.

  • प्रभावित करने वाले कुछ प्रमुख कारक:  
    • वंशानुक्रम
    • घर एवं बाहर का वातावरण
    • मां बाप भाई बहन की सन्गति
    • पड़ोस तथा स्कूल में सन्गति
    • पौष्टिक भोजन
    • शुद्ध हवा तथा प्रकाश
    • सम्वेगात्मक स्थिति
    • परिपक्वता
    • अभिरूचि
    • सिखने की इक्षा
    • शारिरीक मानसिक स्वस्थ्य
    • लिन्गीय भेद
    • बौद्धिक-स्तर
    • आकान्क्षा-स्तर
    • अन्तः स्त्रावी ग्रंथियाँ
    • पारिवारिक परिस्थितियां
    • भौगोलिक स्थिति

यदि इनमें से साकारात्म्क कारक उपस्थित तथा नाकारात्मक कारक अनुपस्थित होते हैं तब वृद्धि एवं विकास की प्रक्रिया तीव्र गति से वान्च्छित दिशा में प्रवृत होती है.

अधिगम

आसान शब्दों में कहें तो अनुभव द्वारा आदतों में बदलाव लाना ही अधिगम कहलाता है. अधिगम अभ्यास या अनुभुति के कारण व्यवहार में होने वाला स्थायी परिवर्तन है. परिक्षा में पास करना, पाठ्यपुस्तक रट लेना, आदि को पूर्ण रूप से अधिगम नही कहा जा सकता. आदत, ज्ञान व अभिवृत्तियों को अर्जित करना ही अधिगम है. अधिगम से व्यवहार में परिवर्तन आता है. अधिगम मनुष्य के वातावरण के साथ निरन्तर अनुक्रिया का परिणाम होता है.

परिपक्वता

मनुष्य के शरीर में अभिवृद्धि और उसकी मानसिक शक्तियों में विकास एक अवस्था तक पहुंचते पहुंचते अपने पूर्ण रूप में हो जाता है. सही मायने में इसी अवस्था को परिपक्वता कहते हैं.

बाल विकास के पक्ष

बाल विकास का क्षेत्र व्यापक है, इसमें उसका सामजिक सांस्कृतिक, बौद्धिक तथा अध्यात्मिक आदि सभी प्रकार का विकास सम्मिलित होता है. अध्ययन के दृष्टिकोण से इसके निम्नलिखित पक्ष पहत्वपूर्ण हैं-

  1. शरिरिक विकास
  1. मानसिक विकास
  1. क्रियात्मक विकास
  1. सम्वेगात्मक विकास
  1. भाषा विकास

शारिरीक विकास

शारिरीक विकास बालक के अन्य सभी विकासों को प्रभावित करता है. नाड़ी तंत्र में वृद्धि होने से बच्चों में सम्वेगात्मक स्थिरता आती है, मांसपेशियों में वृद्धि होने से उनमे गामक क्षमता बढती है और अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों के रसों द्वारा उनमे अनेक परिवर्तन होते हैं. ये सभी परिवर्तन व्यवहार को प्रभावित करते हैं. अनुवांशिक गुणों का प्रभाव भी शारिरीक विकास पर पड़ता है. जन्म का समय, माँ का आहार, जन्म क्रम, आर्थिक स्थिति, गर्भस्थ शिशु की क्रियायें, शारीरक अनुपात, भौगोलिक स्थिति इत्यादी बालक के शारिरीक विकास को प्रभावित करते हैं.

मानसिक विकास

बालक के मानसिक विकास से तात्पर्य उसकी मान्सिक क्रिया एवं योग्यताओं के विकास से होता है. इसके अन्तर्गत बुद्धि संवेदन, निरिक्षण, प्रत्यक्षीकरण, रूचि, ध्यान, कल्पना, चिन्तन, तर्क, निर्णय, स्मृति और विस्मृति आदि मानसिक क्रियाओं एवं योग्यताओं का विकास आता है.बालक का विकास मनो-शारिरीक होता है. अर्थात मानसिक विकास और शारिरीक विकास एक-दुसरे से सह सम्बन्धित है. बालक में प्रायः स्नायुविक दुर्बलता मनोवैज्ञानिक कारणों से आती है. वह सभी लोगों से प्यार और सहानुभूति की अपेक्षा करता है. अतः मनो-शारिरिक विकास के बारे में शिक्षक को पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए.

क्रियात्मक विकास (Motor Development)

क्रियात्मक विकास का तात्पर्य शरीर की गतिविधियों पर नियन्त्रण स्थापित करना है. अर्थात व्यक्ति की क्रियात्मक शक्तियों, क्षमताओं , योग्यताओं का विकास विभिन्न प्रकार की शारिरीक गतिविधियां जैसे- चलना, दौड़ना, पकड़ना, खेलना, उछलना, आदि क्रियात्मक विकास है. क्रियात्मक विकास गर्भकालीन अस्वस्था से ही आरम्भ हो जाता है परन्तु जन्म के बाद इसमे तीव्रता और स्पष्टता आ जाती है. बच्चों की मांसपेशियां जितनी मजबूत और परिपक्व होंगी वह उतना ही अधिक शारिरीक क्रियाओं पर नियन्त्रण कर सकता है. तन्त्रों एवं मान्सपेशियों की परिपक्वता पर ही कौशलों की निर्भरता होती है. क्रियात्मक नियन्त्रण से बालक में सामाजीकरण शारिरीक सुरक्षा का भाव विकसित होता है.

सम्वेगात्म्क विकास

संवेग की उत्पति जन्म के साथ होती है. संवेग एक प्रकार की आन्तरिक उत्तेजना है. संवेग ऐसी अवस्था है जो व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है. प्रसन्नता, दुख, क्रोध, घृणा, आश्चर्य, स्नेह, द्वेष इत्यादी सभी सभी भाव मनुष्य के जीवन के साथ रहते हैं. लेकिन कुछ व्यक्ति इनका समाज में परिष्करण, शोधन तथा नियन्त्रण करके सही दिशा प्रदान करते हैं. मनुष्य में सभी प्रकार के भाव अन्तर्निहित होते हैं जैसी परिस्थिती हो यह उद्दीपन होता है उसी के अनुरूप ये व्यक्त होते हैं. सम्वेगात्म्क विकास के कई कारक होते हैं, इनकी जानकारी शिक्षकों को होनी चाहिए.

भाषा विकास

भाषा में सम्प्रेसण के वे सभी साधन आते हैं जिसमें विचारों एवं भावों को प्रतीकात्मक बना दिया जाता है जिससे की वे अपने विचारों एवं भावों को दुसरे से अर्थपूर्ण ढंग से कहे.

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बच्चा जन्म के बाद रोता है यह उसकी प्रथम भाषा है. अतः कहा जा सकता है कि वाणी ही भाषा का एक विशिष्ट ढंग है. वाणी व्यक्तित्व का आईना है। वाणी से समाज में सम्मान या अपमान मिलता है. भाषा विकास की महत्वपूर्ण अवस्था शब्द भण्डार में वृद्धि है. भाषा को सिखने का महत्वपूर्ण क्रम वाक्य निर्माण का है जियमें बालक शब्दों को जोड़कर वाक्य बनाता है.

सामजिक विकास

बालक में समाजिक भावनाओं का विकास जन्म से शुरू हो जाता है. सामाजिक गुण भी बच्चों में धीरे धीरे पनपते हैं. यह समाजिक विकास अथवा सामाजीकरण के नाम से जानी जाती है. व्यक्ति एवं समाज एक दुसरे के पूरक हैं. व्यक्ति से समाज बनता है तथा समाज व्यक्ति के कल्याण के लिए कार्य करता है. सामाजीकरण की प्रक्रिया में सभी बच्चों को न केवल उन मान्दन्डों की जानकारी होनी चाहिए बल्कि उस मान्दन्ड पर चलने का व्यवहार भी प्रदर्शित करना चाहिए. 

Note: All source are taken from various text books and study materials. The posting purpose is to learn only

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